महात्मा गांधी की जीवनी, जीवन परिचय, निबंध, जयंती 2021 | Mahatma Gandhi Biography in Hindi

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मोहनदास करमचंद गांधी, राष्ट्रपिता और बापू आदि कई नामो से जाने जाने वाले भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी तथा भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के महान क्रांतिकारी और राजनेता थे जिन्होंने अपने अहिंसा परमो धर्मं और सत्य के विचारो से पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनायीं और भारत की स्वतंत्रतादिलाने और स्वराज्य हासिल करने में सबसे अहम् भूमिका निभायी, राष्ट्रपिता का दर्ज़ा सबसे पहले सुभाष चन्द्र बोस द्वारा महात्मा गांधी को दिया गया क्युकी उनका मानना था की गांधी जी ने एक पिता की तरह स्वतंत्रता आन्दोलन का मागदर्शन किया है

गांधी जी ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए जीवन में बहुत सी अनावश्यक चीजों का त्याग किया था उन्हें यह सिख भगवत गीता, बाइबिल और बुद्ध चरित जैसी पुस्तकों से मिली थी जिसको सम्मिलित करके वह इस निष्कर्ष पर पहुचे थे की सत्य और त्याग ही सबसे बड़ा धर्म है

विदेश में बैरिस्टर (वकालत) की शिक्षा ग्रहण करने के बाद काफी समय तक वे दक्षिण अफ्रीका में रहे अपने काम के साथ साथ वह पर भी उन्होंने कई सत्याग्रह आन्दोलन किये और भारतीय प्रवाशियो के अधिकारों का हनन होने से रोका और सामाजिक और राजनैतिक अधिकार दिलाये, गांधी जी ड=अहिंसा के पुजारी थे उनका मानना था की कोई यदि आपके एक गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके सामने अपना दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए, उनका मानना था की ऐसा करने से आपके विरोधी का मन परिवर्तित किया जा सकता है, उनका यह भी मानना था की यदि कोई आपसे नीचता का व्यव्हार भी करता है तब भी आपको उससे आदर के साथ पेश आना चाहिए

शिक्षक दिवस पर भाषण

महात्मा गांधी की जीवनी | Mahatma Gandhi Biography

महात्मा गांधी की जीवनी | Mahatma Gandhi Biography in Hindi
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पूरा नाममोहनदास करमचंद गांधी
जन्म02 अक्टूबर 1869
जन्मस्थानपोरबंदर, गुजरात
शिक्षाबैरिस्टर (वकालत)
पिताकरमचंद गांधी (दीवान)
मातापुतलीबाई
पत्नीकस्तूरबाई (कस्तूरबा गांधी)
मृत्यु30 जनवरी 1948
गांधी जी की जीवनी (Mahatma Gandhi Biography)

गांधी जी का खानदान पोरबंदर से सम्बन्ध रखता था उनके दादा उत्तम चंद गांधी अथवा ओता गांधी को किन्ही कारणों वश पोरबंदर छोड़कर जूनागढ़ राज्य में आश्रय लेना पड़ा था, उत्तम चंद के पांचवे पुत्र थे करमचंद गांधी अथवा कबा गांधी जो की पोरबंदर में दीवान के पद पर कार्यरत थे कबा गांधी के जीवनकाल में चार बार विवाह हुआ जिनमे से आखिरी पत्नी पुतलीबाई से एक पुत्री और तीन पुत्र हुएं जिनमे गाँधी जी आखिरी थे

महात्मा गांधी का प्रारंभिक जीवन

महात्मा गाँधी का जन्म 02 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर अथवा सुदामापुरी में हुआ था. इनका बचपन पोरबंदर में ही बीता उनकी प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर के एक स्कूल में ही हुयी थी हलाकि बचपन में वे पढाई में उतने अच्छे नही थे बल्कि एक साधारण छात्र की तरह ही थे

7 साल की उम्र में गाँधी जी के पिता करमचंद का ट्रान्सफर राजकोट के स्थानीय कोर्ट में कर दिया गया उसके बाद आगे की शिक्षा उनकी राजकोट में हुयी. राजकोट से उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की, वह बचपन से ही शर्मीले किस्म के व्यक्ति थे और कोई मुश्किल से ही उनका दोस्त बनता था

महात्मा गाँधी का विवाह 13 वर्ष की आयु में बाल्यावस्था में करा दी गयी थी उनकी पत्नी का नाम कस्तूरबाई (कस्तूरबा गाँधी) था उनकी पत्नी पढ़ी लिखी नहीं थी परन्तु स्वाभाव से सीधी , स्वतंत्र, मेहनती और कम बोलने वाली थी बचपन में ही महात्मा गाँधी को देशप्रेम की ललक जग उठी थी हलाकि उनको बचपन में स्वराज्य शब्द का मतलब तक नही पता था मगर स्वतंत्रता क्या होती है इससे वे भलीभांति परिचित थे

महात्मा गाढ़ी का जन्म एक वैष्णव परिवार में हुआ था उनके माता पिता धर्म और पूजा पाठ के प्रति बहुत सक्रिय थे हलाकि गाँधी जी बचपन में पूजा पाठ में अधिक रूचि नही रखते थे परन्तु उनके शर्मीले व्यक्तित्व और भुत प्रेत आदि के दर के कारन उन्होंने अपनी एक नौकरानी के कहने पर रामनाम का जप शुरू किया, बचपन में बोया गया रामनाम का बिज़ अन्तकाल तक उनके साथ रहाऔर वह रामनाम ककी भक्ति में सदैव लीं हो जाते थे

मेट्रिकुलेसन के बाद कॉलेज की शिक्षा के भावनगर के शामलदास कॉलेज में भारती हो गए परन्तु वह पर उनका मन नही लगा उनके पिता के पुराने मित्र की सलाह पे उन्हीने विदेश में आगे की पढाई करने का निश्चय किया, 16 वर्ष की आयु में इनके पिता करमचंद का बीमारी के कारन निधन हो गया, कबा गाँधी के इमानदार, सत्यवादी, उदार किन्तु क्रोधी व्यक्ति थे माता धर्म प्रिय और पूजा पाठ करने वाली और श्रद्धालु महिला थी

महत्मा गांधी लन्दन में (शिक्षा, वकालत, बैरिस्टर)

लन्दन में बैरिस्टर की पढाई के लिए मोहनदास 1888 में मुंबई बंदरगाह से लन्दन के लिए रवाना हुए, शुरू में उन्हें विदेश में कुछ मुलभुत जरूरतों और वह के रहन सहन को अपनाने के लिए काफी जद्दोजहत करनी पड़ी, चुकी उन्होंने अपनी माता से यह प्रतिज्ञा की थी की वह मासाहार और मदिरा से दूर रहेंगे जिस कारन उन्हें कई सीनों तक भूखा रहना पड़ता था इसके अलावा अंग्रेजी भाषा की अधिक समझ न होने के कारन बोलचाल में भी काफी परेशानी होती थी काफी जद्दोजहत के बाद उन्हें एक शाकाहारी भोजनालय तो मिल गया था परन्तु उसके लिए उन्हें मिलो पैदल चलकर दूर जाना पड़ता था

विदेश में रहकर उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा को सिखा चुकी फ्रेच यूरोप की राष्ट्र भाषा थी अतः आम बोलचाल में इसका बहुत अधिक प्रयोग होता था उन्होंने एक विदेशी मित्र के कहने पर भगवत गीता का पाठ किया जिसका उनपर बहुत गहन असर पड़ा और भगवत गीता उनके लिए सर्वोत्तम ग्रन्थ बन गया

इसके अलावा उन्होंने अर्नाल्ड की बुद्ध चरित “धा लाइट ऑफ़ एशिया” पढ़ी जिसमे उनको काफी रूचि हुयी उनकी मुलाकात वहा पर एनी बेसेंट से हुयी जिन्होंने हाल ही में थियोसोफिकल सोसाइटी ज्वाइन की थी भगवत गीता, बुद्ध चरित और बाइबिल पुष्तक पढने के बाद उनका मन धर्म के प्रति काफी मोहित हुआ और उनको यह समझ में आ गया की त्याग ही असल धर्म है |

भारत वापसी – बैरिस्टर बाबू

10 जून 1891 को बारीस्टर की परीक्षा पास कर महात्मा गाँधी बारीस्टर कहलाये, और भारत वापसी की, जब भारत पहुचे तब पता चला की उनकी माता पुतली बाई का स्वर्गवास हो चूका था यह बात उनके बड़े भाई ने उनसे बताई

भारत आने के बाद कुछ समझ न आया तो वे मुंबई वकालत करने के लिए चले गए वह पर कुछ दिन तक वकालत की लेकिन बात न बन पायी तो उन्होंने शिक्षक बनने का निश्चय किया परन्तु किन्ही कारन वश वह भी बात न बन सकी और अंत में उन्हें वापस अपने घर राजकोट में आना पड़ा

अफ्रीका की यात्रा (1893-1914 तक)

1893 में गाँधी जी को एक केस के सिलसिले में अफ्रीका जाने का न्योता मिला था जो किसी रईस सेठ का था जिसे वह कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने आपसी सुलह से मामला निपटवा दिया था वह पहले भारतीय थे जो वह गए थे और उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वह पर उन्हें नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा, भारतीय को वह पर छोटा समझा जाता था और उन्हें ट्रेन में पहली क्लास में बैठकर सफ़र करने की मंजूरी नही थी इसके अलावा अच्छे होटल में भी भारतीय लोग नही रुक सकते थे

वहा पर उन्होंने उपनिवेशों में कार्य कर रहे भारतीयों के ऊपर अत्याचार देखा न गया और उन्होंने भारतीय मताधिकार प्रतिबंधक कानून के प्रति अपनी अरुचि दिखाई जिस हेतु उन्होंने नाताल इंडियन कांग्रेस नमक संस्था की स्थापना की दक्षिण अफ्रीका में भारत वासियों को प्रति नस्ली भेदभाव और सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों का दमन उनसे देखा नही गया जिस हेतु 1906 में उन्होंने अवज्ञा आन्दोलन(Disobedient Movement) चलाया जिसे सत्याग्रह आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है अब उन्हें यह ज्ञात हो चूका था की शांतिप्रिय तरीके से भी शत्रु से अपनी मांग मानने के लिए मजबूर किया जा सकता है

उन्होंने अपने जीवन के अनमोल 21 वर्ष अफ्रीका में ही बिताये जहा पर उन्होंने राजनैतिक, कानूनी और नेतृत्व का गहन अनुभव प्राप्त किया जब वह भारत आये तो उन्होंने हरी पुस्तिका नाम से एक पुस्तक लिखी जिसमे दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों की स्थिति का चित्रण किया गया था

महात्मा गांधी की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

गांधी जी जनवरी 1915 में अफ्रीका से भारत लौटे थे हालाकि बाल कृष्ण गोखले पहले ही गांधी जी से अफ्रीका में मिल चुके थे और भारत में लौटने के बाद भारत वासियों को यह विश्वास दिला चुके थे की गांधी एक बलिदानी और संघर्षशील आन्दोलनकारी नेता के समस्त गुण है

गांधी जी के लौटने पर भारतवासियों ने बहुत ही उत्सुकता से उनका स्वागत किया, यह कहा जाता है की भारत लौटने के बाद उन्होंने किसी भी स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा नही लिया क्यों की उनका मानना था की किसी भी आन्दोलन में हिस्सा लेने से पहले उसके बारे में अच्छी तरीके से जाच लेने के बाद ही उसमे सक्रिय रूप से प्रतिभाग किया जा सकता है

गांधी जी ने समस्त भारत भ्रमण करने का निश्चय किया ताकि वे जमीन से जुड़े लोगो की समस्याओ का आकलन कर सके और समझ सके की गुलामी या फिर आजादी यानी स्वतंत्रता (स्वराज्य) का उनपर क्या असर पड़ेगा क्युकी गांधी एजी का मानना था की भारत को सही मायने में स्वतंत्रता तभी मिल पायेगी जब उसका लाभ सबसे निचले स्तर के व्यक्ति तक भी पहुच पाए, अपने भारत भ्रमण के दौरान गांधी जी ने कई स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिए और उन्हें सफल बनाया

महात्मा गांधी के भारत में प्रमुख आन्दोलन

वैसे तो गांधी जी ने बहुत से आन्दोलन किये उन्होंने किसानो, मजदूरो और अन्य वर्गों के लिए जीवन भर बहुत से आन्दोलन किये जिनमे से कुछ प्रमुख आन्दोलनों की सूचि निम्नवत है –

  • चंपारण, अहमेदाबद और खेड़ा सत्याग्रह (1917 से 1918)
  • खिलाफत आन्दोलन (1919 में)
  • असहयोगआन्दोलन (1920 से 1922)
  • सविनय अवज्ञा आन्दोलन, दांडी मार्च (1930 में )
  • भारत छोड़ो आन्दोलन (1942 में)

चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधी जी का सत्याग्रह

1917 से 1918 में गांधी जी ने तीन मुख्या सत्याग्रह आन्दोलन किये जिनमे उनको अपर सफलता मिली, इनमे चंपारण (बिहार में ) और अहमदाबाद और खेड़ा (गुजरात में) उन्होंने आन्दोलन किये जिसे उन जगहों के नाम पर ही आन्दोलन का नाम रख दिया गया,

सबसे पहले चंपारण का सत्याग्रह अन्दोनल जो की गांधी जी शुरू में तैयार नही हुए लेकिन राजकुमार शुक्ल के बार बार कहने के बाद अंत में वे चंपारण जाने को तैयार हो गए, चंपारण जो की बिहार में स्थित है वह पर काफी समय पहले से अंग्रेजो में तिनकठिया पद्धति लगा रखी थी जिसमे किसानो को अपनी 3/20 हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था इससे किसानो को बहुत नुसान हो रहा था गांधी सबसे पहले वहा के गरीब किसानो से खुद इस मसले की जाच पड़ताल की और पाया की सही में किसानो का दमन किया जा रहा था उसके बाद गांधी जी ने चंपारण में सत्याग्रह आन्दोलन शुरू किया जिसे चंपारण आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है उन्होंने बड़ी ही शांतिप्रिय तरीके से आन्दोलन किया और अंग्रेजो को अपनी बात मनवाई और सफल हुए

अहमदाबाद में मिल मजदूरो और मालिको में बोनस को लेकर काफी विवाद चल रहा था जिसको सुलझाने के लिए मजदूरो ने गांधी जी से मदत की गुहार की और गांधी जी इसके लिए तैयार भी हो गए उन्होंने मजदूरो को पहले से मिल रहे बोनस, जो की मिल मालिको के लिए अधिक रकम थी, से भी जादा दिलाया चुकी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान महंगाई बढ़ी थी मगर मिल मजदूरों का वेतन ज्यो का त्यों था एक छोटे से अनसन के बाद गांधी जी को सफलता मिली और मिल मजदूरों को उनका हक़ मिल गया था

खेड़ा में फसल बर्बाद हो जाने के बाद भी जबरन अंग्रेजो द्वारा किसानो से कर वसूला जा रहा था जो बात गांधी जी को गवारा नही लगी और उन्होंने सरकार के कर वसूली नियमो की अवहेलना करने का फैसला किया और सफल भी हुए

उपरोक्त तीन आन्दोलनों ने गांधी जी को एक अलग पहचान दी और अब वे भारत के आन्दोलन कर्तो की नज़र में एक सम्मानित व्यक्ति बन गए थे और गांधी जी देश की जनता के और करीब आ चुके थे

खिलाफत आन्दोलन

खिलाफत आन्दोलन एक मुस्लिम बाहुल्य आन्दोलन था जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा का प्रभुत्व कमजोर पड़ रहा था तब भारत से आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस ने खलीफा का समर्थन करना चाहा इसके लिए मुस्लिम समुदाय ने गांधी जी से आग्रह किया की वे इस विश्व व्यापी आन्दोलन का समर्थन करें | इससे गांधी जी को मुस्लिम समुदाय के बिच अपनी जहग बनाने का मौका मिला इस आन्दोलन के जरिये गांधी जी ने समस्त मुस्लिमो से यह गुजारिस की कि वे अपने सारे सम्मान और मेडल्स अंग्रेजो को लौटा दे और अंग्रेजी सरकार का विरोध करें

गांधी जी का असहयोग आन्दोलन

दोस्तो यह बात तो सर्वविदित है की बिना देश की जनता से सहयोग से किसी सरकार का कार्य कर पाना संभव नही है, जब भारत में रोलेट एक्ट पारित हुआ तब लोगो में बहुत जादा आक्रोस उत्पन्न हो गया था देश में जगह जगह पर सभाओ का आयोजन हो रहा था और अंग्रेजी सरकार के बहिस्कार की बाते चल रही थी उस समय पंजाब के जलिआवाला बाग़ में एक शांति सभा का आयोजन किया गया था जिसपर अंग्रेजो ने गोलियों की बारिश कर दी और बहुत से लोगो की जान चली गयी देशभर में जनाक्रोस को देखते हुए गांधी जी ने 1920 में असहयोग आन्दोलन शुरू किया जिसका मूल उधेश्य था बिना किसी हिंसा के अंग्रेजी सरकार का बहिस्कार करना

चुकी गांधी जी का और अन्य लोगो का यह मानना था की अंग्रेजी सरकार हम पर राज कर प् रही है क्युकी भारतीयों द्वारा उनका सहयोग किया जा रहा है अत उनका मानना था की बिना कोई हिंसा किये अगर अंग्रेजी सरकार का सहयोग करना बंद कर दिया जाए तो हमें आजादी मिल सकती है बस क्या था लोगो ने इस आन्दोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया, लोगो ने सरकारी दफ्तरों से इस्तीफा दिया, बच्चो को अंग्रेजी स्कूल से नाम कटवा दिया और अंग्रेजी कपड़ो का बहिस्कार कर खादी कपडे पहनना शुरू कर दिया यह आन्दोलन बहुत ही शांति प्रिय ढंग से चल रहा था की अचानक यह पता चला की उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा नामक जगह पर जनांदोलन ने हिंसात्मक रूप ले लिया है जहा पर कुछ लोगो ने एक पुलिस ठाणे को ही आग लगा दिया था जिसमे कई पुलिस वालो की मौत हो गयी थीइस हिंसात्मक कार्यवाही से गांधी जी को गहरा आघात हुआ और 1922 में गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया

गांधी जी का सविनय अवज्ञा आन्दोलन

यह आन्दोलन गांधी जी का एक अन्य महत्वपूर्ण आन्दोलन था जिसे असहयोग आन्दोलन के कई वर्षो बाद शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य था अंग्रेजो द्वारा बनाये गए कानूनों का अहिंसा पूर्वक अवहेलना करना या न मानना था अंग्रेजो द्वारा नमक क़ानून के विरोध में गांधी जी ने अपने साबरमती आश्रम से एक दांडी यात्रा निकाली जिसका मूल ओद्देश्य था गुजरात के तट पर स्थित दांडी नमक स्थान पर जाकर नमक का उत्पादन करना और अंग्रेजी नमक कानून का विरोध करना, एक छोटी सी यात्रा जो लगभग 24 दिनों तक चली और इसमें हजारो लोगो ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और बिना कोई टैक्स दिए नमक का उत्पादन कर इस यात्रा को गांधी जी द्वारा सफल बनाया गया

इसी समय भारतीय कांग्रेस ने संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा कर दी थी उन्होंने गांधी की के अहिन्शात्मक सत्याग्रह आन्दोलन के उद्देश्य को कांग्रेस में समायोजित किया और उनके नेतृत्व में कई आन्दोलन और सभाए की अंतत अंग्रेजो को अपने घुटने पर झुकने को मजबूर कर दिया गया और सविनय अवज्ञा आन्दोलन को सफलता मिली, इस आन्दोलन में 60 हज़ार से अधिक लोगो को गिरफ्तार कर लिया गाय था जिस हेतु 1931 में गांधी-इरविन संधि हुयी और गिरफ्तार किये गए कैदियों को रिहा कर दिया गया

भारत छोड़ो आन्दोलन – QUIT INDIA MOVEMENT

भारत छोड़ो आन्दोलन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू किया गया था हलाकि यह युद्द् विश्व स्तर पर चल रहा था लेकिन भारत की स्वतंत्रता के लिए यह मिल का पत्थर साबित हुआ गांधी जी और कांग्रेस का यह मानना था की एक तरफ अंग्रेजो की दमनकारी नीतिया भारत के लोगो का शोषण कर रही थी और दूसरी तरफ वह विश्व युद्ध के लिए भारतीयों का इस्तेमाल कर रही थी इस समय गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की मांग कर दी और भारत के लोगो से किसी भी प्रकार के सहयोग ना देने की मांग की चुकी गांधी जी का यह मानना था की यही समय है जब अंग्रेजो पर दबाव डालकर अपनी बातो को मनवाया जा सकता है

चुकी गांधी जी ने अंग्रेजो क यह संकेत दे दिया था की भारत की जनता विश्व युद्द में तभी सहयोग करेगी जब यह सुनिश्चित किया जाये की युद्द के बाद अँगरेज़ भारत छोड़कर चले जायेंगे और भारत में पूर्ण स्वराज होगा, चुकी किसी भी बड़े आन्दोलन के पूरी तरह सफल ना हो पाने का सबसे बड़ा कारन यही था की उसमे समय जादा लग जाता था जिससे धीरे धीरे लोगो का उत्साह भी कम हो जाता था मगर भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान यह समझ में आ गया था की यही मौका है अत उन्होंने बिना किसी हिंसा के लोगो से करो या मरो की गुहार लगाई

इस आन्दोलन का फायदा यह रहा की द्वितीय विश्व युद्द समाप्त होने तक अँगरेज़ समझ चुके थे की अब भारत देश में उनकी दाल नही गलने वाली और उन्होंने अपनी सता देश के हाथों में सौपने का निर्णय कर लिया था चुकी मुस्लिम समुदाय का यह मानना था की देश को आजादी दिलाने में उनका भी उतन ही हाथ था जितना हिन्दूओ का था इसीलिए जिन्ना के नेतृत्वा में मुस्लिम समुदाय ने एक मुस्लिम बाहुल्य देश (पाकिस्तान) की मांग की और देश का विभाजन अन्रेजो द्वारा दो हिस्सों में कर दिया गया

महात्मा गांधी की मृत्यु

30 जनवरी 1948 को गांधी जी की मृत्यु कर दी गयी थी नाथूराम गोडसे नमक व्यक्ति ने उनपर गोलिया दागकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था हलाकि नाथूराम गोडसे को बाद में कोर्ट द्वारा मौत की सजा दी गयी परन्तु गांधी जी की मृत्यु देश के लिए एक महान नेता राष्ट्रपिता (बापू) को खो जाने का दुःख था जिसकी भरपाई नही की जा सकती थी

गांधी जी के विचार

दोस्तो गांधी जी ने अपने कुछ विचार दिए है जो की उनका मानना था की उनके अनुभव से जो उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है वह किसी अन्य के जीवन को भी मार्गदर्शन देने में अहम् भूमिका निभा सकती है उन्ही में से कुछ हम आज आपके लिए यह दिए है –

मै आशावादी हू, इसलिए नही की मई इसका कोई सबूत दे सकता हुकी सच्चाई ही फलेगी बल्किइसलिए की मेरा इस बात में अदम्य विस्वास है की अंतत सच्चाई ही फलती है, हमारी प्रेरणा हमारे केवल इसी विश्वास से पैदा हो सकती है की अंतत सच्चाई की ही जीत होगी

महात्मा गांधी

ह्रदय से सच्ची और सुद्ध कामना अवश्य पूरी होती है अपने अनुभव में मैंने इस कथन को सदैव ही पाया है गरीबो की सेवा में सदैव कामना रही है और इसने मुझे सदा गरीबो के बिच ल खड़ा किया है और मुझे उनके साथ तादाम्य स्थापित करने का अवसर दिया है

महात्मा गांधी

Reference:

https://www.mkgandhi.org/

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